Thursday, 14 May 2020

Sanskaar

संस्कार का मूल अर्थ 'शुद्धिकरण' हैं। संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों से था जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का पूर्ण रूप से सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके शरीर ,मन और मस्तिष्क को पवित्र करने के लिए किए जाते थे। किंतु हिंदू संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति मे अभिष्ट गुणों को जन्म देना भी था। 
प्राचीन भारत में संस्कारों का मनुष्य के जीवन मे बहुत महत्व था। जो अब नहीं हैं। संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृतियों का पूर्ण विकास करके अपने और समाज दोनों का कल्याण करता था।
ये संस्कार मनुष्य को इस जीवन को ही पवित्र नहीं करते थे। उसके परलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते थे। प्रत्येक संस्कार से पूर्व हवन यज्ञ किए जाते थे। जो आज बिल्कुल खत्म हो चुके है ।

संस्कारों का विवेचन मुख्य रूप से ग्रह्यसूत्रों मे ही मिलता हैं। 

गौतम धर्मसूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस लिखी है। ये चालीस संस्कार निम्नलिखित हैं:-

1. गर्भाधान,
2. पुंसवन,
3. सीमंतोन्नयन,
4. जातकर्म,
5. नामकरण,
6. अन्न प्राशन,
7 चौल,
8. उपनयन,
9-12. वेदों के चार व्रत,
13. स्नान,
14. विवाह,
15-19 पंच दैनिक महायज्ञ,
20-26 सात पाकयज्ञ,
27-33 सात हविर्यज्ञ,
34-40 सात सोमयज्ञ।

अब कलयुग मे ये सभी संस्कार खत्म हो चुके है इन्हें अब तत्वज्ञान से ही शुरू किया जा सकता हैं और तत्वज्ञान केवल भगवान या भगवान का नुमाइदा संत ही ठीक से बता सकता हैं और एक समय मे पुरी पृथ्वी पर तत्वज्ञान देने वाला संत भी एक ही होता हैं वह संत वर्तमान मे भारत के हरियाणा प्रांत मे आए हुए हैं और तत्वज्ञान बांट रहे हैं पर जनता अभी समझ नहीं रही हैं समय आने पर सब समझ जाएंगे।

Sanskaar कैसे जुडते हैं???
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तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ही वर्तमान मे पूर्ण संत और पूर्ण परमात्मा के नुमाइंदे हैं जो विश्व को सतभक्ति प्रदान कर रहे है और उनका कल्याण कर रहे है। और संस्कार और संस्कृति की बात करे तो उनके शिष्यों को एक बार देख ले तो ऐसा लगेगा यह तो साक्षात देवता ही हैं इतने संस्कार संत रामपाल जी महाराज ने हमे दिए हैं।
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