Sunday, 31 May 2020

52 Cruelities On GodKabir.

5 June 2020कबीर परमेश्वर प्रकट दिवस
 कबीर परमात्मा ही अमर परमात्मा हैं।

कबीर साहेब जी 600 साल पहले काशी शहर मे प्रकट हुए तथा वहां अपनी लीला शुरू की तो कुछ लोगों को सच्चाई हजम नहीं हुई और राजा सिकंदर लोधी द्वारा कबीर परमात्मा को मारने के 52 बार प्रयत्न किए जिससे कबीर साहेब का एक भी बाल बांका नहीं हुआ अर्थात मरे नहीं!!!
कुछ व्यर्थ के प्रयत्न आपको यहां बता रहे है।
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1. खूनी हाथी से मरवाने की व्यर्थ चेष्टा
शेखतकी के कहने पर दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी ने कबीर परमेश्वर को खूनी हाथी से मरवाने की आज्ञा दे दी। शेखतकी ने महावत से कहकर एक दो शीशी शराब पिलाने को कहा। 
हाथी मस्ती मे भरकर कबीर परमेश्वर को मारने चला। कबीर जी के हाथ पैर बांधकर पृथ्वी पर डाल रखा था। जब हाथी परमेश्वर से 10  कदम दूर रह गया तो परमेश्वर कबीर के पास बब्बर शेर खडा केवल हाथी को ही दिखाई दिया। हाथी डर से चिल्लाकर भागने लगा। परमेश्वर के सब रस्से टूट गए। उनका तेजोमय विराट रूप सिकंदर लोधी को दिखा। तब सिकंदर लोधी ने कांपते हुए चरणों में पडकर अपने गुनाह की माफी मांगी।।

2. उबलते तेल में जलाने की चेष्टा
    परमेश्वर कबीर जी को जीवित जलाने के लिए उन्हें उबलते तेल के कडाहे में डाला गया। लेकिन समर्थ अविनाशी परमात्मा का बाल भी बांका नहीं हुआ।



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शेखतकी ने जुल्म गुजारे,बावन करी बदमाशी।
 
 शेखतकी ने ईर्ष्या वश कबीर साहेब को मारने के लिए 52 प्रकार के षडयंत्र रचे। जिसे बावन कसनी कहते हैं।
वह हर बार असफल रहा। 
क्योंकि अविनाशी का नाश करने में कोई सक्षम नहीं।
यदि आम संत होते तो मारे जाते।
कबीर साहेब पूर्ण ब्रह्म हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं, उनका एक तत्व का नूरी अमर शरीर हैं।

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Saturday, 30 May 2020

MagharLeela Of GodKabir

5 June 2020 कबीर परमेश्वर प्रकट दिवस
कबीर परमात्मा चारों युगों मे आते हैं ,अपनी लीला करते हैं, तत्वज्ञान देते है।
मगहर से सशरीर जाने की लीला भी की। आज कबीर परमात्मा स्वयं संत रामपाल जी महाराज के रूप में लीला कर रहे हैं।
उन्हें पहचानिए, नाम उपदेश लीजिए। ये मनुष्य शरीर और मोक्ष का दांव लगा हैं। 
Kabir Is God
कबीर परमात्मा मगहर से जब सतलोक गए थे! जब कबीर जी के शरीर को प्राप्त करने के लिए दोनों दीन ,हिंदू और मुसलमान आपस में झगडे की तैयारी करके मगहर आए थे। लेकिन जब शरीर के स्थान पर सुगंधित फूल मिले तो दोनों आपस में लिपट लिपट कर रोने लगे।
जिंदा जोगी जगतगुरु, मालिक मुरशद पीर।
दहूँ दीन झगडा मंड्या, पाया नहीं शरीर।।
मगहर भविष्यवाणी
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कांशी के ब्राह्मणों ने गलत अफवाह फैला रखी थी कि जो कांशी मे मरता हैं वह स्वर्ग जाता हैं और जो मगहर मरता हैं वह गधे का जन्म प्राप्त करता हैं। कबीर परमेश्वर जी ने मनमाने लोकवेद का खंडन करने के लिए मगहर में हजारों  लोगों के सामने सशरीर गये। शरीर की जगह फूल मिले और भविष्यवाणी कर बताया कि मै स्वर्ग और महास्वर्ग से उपर अविनाशी धाम सतलोक जा रहा हू।
परमात्मा कबीर जी के मगहर से सशरीर सतलोक जाने के प्रमाण को मलूक दास जी भी प्रमाणित करते हुये कहते है।:- 

कांशी तज गुरु मगहर आए,दोनों दीन के पीर।
कोई गाडे कोई अग्न जरावे, ढूंढा ना पाया शरीर।।
चार दाग से सतगुरु न्यारा, अजरो अमर शरीर।
दास मलूक सलूक कहत हैं, खोजों खसम कबीर।।
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Friday, 29 May 2020

Allah kabir

#5_June_2020_कबीर_परमेश्वर_प्रकट_दिवस
 
कबीर साहेब जी सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलयुग चारों युगो में अलग अलग नामों से आते है और लीला करते ही। 
1.सतयुग मे सतसुकृत 
2. त्रेतायुग में मुनींद्र
3. द्वापर में करूणामय
3. कलयुग मे अपने वास्तविक नाम कबीर से ही इस धरा पर प्रकट होते है और 
यहां आकर अपनी अच्छी आत्माओं को मिलते है उन्हें अपना ज्ञान बताते हैं और सतलोक दिखाकर भरोसा दिलाते है और सतभक्ति देकर वापस सतलोक चले जाते हैं और हर पल अपने भक्त की रक्षा करते है।

गरीब दास जी को भी परमात्मा कबीर साहेब सतलोक से आकर मिले

गरीब, जैसे सूरज के आगे बदरा, ऐसे कर्म छया रे। प्रेम की पवन करे चित मंजन, झलकै तेज नया रे।।
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कबीर जी ऐसे अविगत राम हैं जो तीनों गुणों तथा भौतिक शरीर की इन्द्रियों से न्यारे हैं। उनका शरीर तथा सामर्थ्य सबसे भिन्न और अधिक है। उसका कोई अन्त नहीं है। वह बेचून यानि अव्यक्त है। जैसे सूर्य के सामने बादल छा जाते हैं, उस समय सूर्य अव्यक्त होता है। उसी प्रकार परमात्मा और आत्मा के मध्य पाप कर्मों के बादल अड़े हैं। जिस कारण से परमेश्वर विद्यमान होते हुए भी अव्यक्त है, दिखाई नहीं देता।

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Thursday, 28 May 2020

5_June_2020_कबीर_परमेश्वर_प्रकट_दिवस

#GodKabir_CreatorOfUniverse 
कबीर परमात्मा ही सर्व सृष्टिकर्ता हैं।
कबीर परमात्मा ने ही सब ब्रह्मांडों की रचना की हैं।
हम सभी आत्माएं कबीर साहेब जी की हैं।
कबीर साहेब जी सशरीर पृथ्वी पर आते है और अच्छी आत्माओं को मिलते है। सतलोक दिखाकर वापस छोडते हैं। कबीर साहेब ने 6 दिन मे सृष्टि रची और सातवें दिन तख्त पर जा विराजे!!! kabir is god 

सभी धर्म ग्रंथ भी प्रमाणित करते हैं कि कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा हैं वहीं सबके जनक हैं।

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Wednesday, 20 May 2020

Bad studies

आज कलयुग के दौर में खराब शिक्षा बहुत फैल रही हैं और यह खराब शिक्षा मनुष्य को जीना नहीं बल्कि दुसरे को कष्ट देना सिखाती हैं। आपको अच्छी शिक्षा देने वाला 1 मिलेगा और 99 लोग गलत शिक्षा देने वाले मिलेंगी इसलिए हम 1 कि बताई गई बात को स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि अधिक लोगों द्वारा बताई गई शिक्षा अच्छी और सही लगेगी!!! 

इसलिए कहते है कि सुनो सब की और करो मन की.....

आज शिक्षा का महत्व केवल नौकरी लगना ही रह गया हैं और हर व्यक्ति यही सोचता हैं कि मै अच्छी पढाई करू और अच्छी नौकरी लग जाऊ मेरे बच्चे अच्छे ठाठ से रहे।
परंतु परमात्मा ने हमें यह शिक्षा केवल और केवल परमात्मा को पहचानने के लिए दी हैं।
यही वास्तविकता है कि वर्तमान शिक्षा-प्रणाली खराब है, लेकिन इस खराब शिक्षा प्रणाली का हल यह नहीं की जैसे चल रही हैं वैसे चलती रहे इसमे आखिर सुधार करना ही पडेगा... और सुधार केवल ज्ञान सही होने से ही हो सकता हैं।

शिक्षा का असली लाभ हम संत रामपाल जी महाराज का ज्ञान सुनकर ले सकते है पढाई का मुख्य उद्देश्य यही हैं की अपने शास्त्रों को पढे और पढकर भगवान की खोज करें।

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Thursday, 14 May 2020

Sanskaar

संस्कार का मूल अर्थ 'शुद्धिकरण' हैं। संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों से था जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का पूर्ण रूप से सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके शरीर ,मन और मस्तिष्क को पवित्र करने के लिए किए जाते थे। किंतु हिंदू संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति मे अभिष्ट गुणों को जन्म देना भी था। 
प्राचीन भारत में संस्कारों का मनुष्य के जीवन मे बहुत महत्व था। जो अब नहीं हैं। संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृतियों का पूर्ण विकास करके अपने और समाज दोनों का कल्याण करता था।
ये संस्कार मनुष्य को इस जीवन को ही पवित्र नहीं करते थे। उसके परलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते थे। प्रत्येक संस्कार से पूर्व हवन यज्ञ किए जाते थे। जो आज बिल्कुल खत्म हो चुके है ।

संस्कारों का विवेचन मुख्य रूप से ग्रह्यसूत्रों मे ही मिलता हैं। 

गौतम धर्मसूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस लिखी है। ये चालीस संस्कार निम्नलिखित हैं:-

1. गर्भाधान,
2. पुंसवन,
3. सीमंतोन्नयन,
4. जातकर्म,
5. नामकरण,
6. अन्न प्राशन,
7 चौल,
8. उपनयन,
9-12. वेदों के चार व्रत,
13. स्नान,
14. विवाह,
15-19 पंच दैनिक महायज्ञ,
20-26 सात पाकयज्ञ,
27-33 सात हविर्यज्ञ,
34-40 सात सोमयज्ञ।

अब कलयुग मे ये सभी संस्कार खत्म हो चुके है इन्हें अब तत्वज्ञान से ही शुरू किया जा सकता हैं और तत्वज्ञान केवल भगवान या भगवान का नुमाइदा संत ही ठीक से बता सकता हैं और एक समय मे पुरी पृथ्वी पर तत्वज्ञान देने वाला संत भी एक ही होता हैं वह संत वर्तमान मे भारत के हरियाणा प्रांत मे आए हुए हैं और तत्वज्ञान बांट रहे हैं पर जनता अभी समझ नहीं रही हैं समय आने पर सब समझ जाएंगे।

Sanskaar कैसे जुडते हैं???
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तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ही वर्तमान मे पूर्ण संत और पूर्ण परमात्मा के नुमाइंदे हैं जो विश्व को सतभक्ति प्रदान कर रहे है और उनका कल्याण कर रहे है। और संस्कार और संस्कृति की बात करे तो उनके शिष्यों को एक बार देख ले तो ऐसा लगेगा यह तो साक्षात देवता ही हैं इतने संस्कार संत रामपाल जी महाराज ने हमे दिए हैं।
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आप भी संत रामपाल जी महाराज द्वारा लिखित पुस्तक निशुल्क डाउनलोड कर सकते है और पढ सकते हैं।
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संत रामपाल जी महाराज की पुस्तक 
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Wednesday, 13 May 2020

दहेज का खात्मा

दहेज दुश्मन हैं
दहेज के कारण आज लाखों बेटियों को जान गंवानी पड रही हैं  परंतु समाज और सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही हैं इससे सिद्ध हैं की यह एक सामाजिक कुप्रथा हैं जिसे केवल आध्यात्मिक ज्ञान से ही खत्म किया जा सकता हैं और दहेज लेना व देना बंद किया जा सकता हैं। 

दहेज एक माया ही हैं और माया कभी भी इंसान को सुखी नहीं होने देती हैं आगे से आगे कुछ ना कुछ करवाती रहती हैं. . . . . .

विवाह कैसे करना चाहिए?
👇🏻कृपया पुरा पढें👇🏻

विवाह मे व्यर्थ का खर्च त्यागना पडेगा। जैसे बेटी के विवाह मे बडी बारात का आना,दहेज देना व लेना यह व्यर्थ की परंपरा अर्थात कुप्रथा हैं। जिस कारण से बेटी परिवार पर भार मानी जाने लगी हैं और उसको गर्भ में ही मारने का सिलसिला शुरू है जो कि माता-पिता के लिए महापाप का कारण बन जाता हैं। बेटी देवी का स्वरूप होती हैं। हमारी कुपरंपराओं ने बेटी को समाज का दुश्मन बना दिया हैं। 
देवीपुराण मे भी प्रमाण
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श्रीदेवीपुराण के तीसरे स्कंद में प्रमाण हैं कि इस ब्रह्मांड के प्रारंभ में तीनों देवताओं(ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवजी ) का जब इनकी माता श्रीदुर्गा ने विवाह किया, उस समय न कोई बाराती था,ना कोई भाती था। न कोई भोजन भंडारा किया था। न डी.जे. बजा था,न कोई नृत्य किया था।

क्या आपने सोचा है कभी!!!!
"दहेज"
यह कुप्रथा किसने चलाई ??? और क्यो ???

दहेज को केवल आध्यात्मिक ज्ञान से ही खत्म किया जा सकता हैं। आज भी संत रामपालजी महाराज जी लाखों बेटियों का विवाह बिना दान,दहेज के बिल्कुल फ्री में करवा रहे है। और सभी लडकियां बिल्कुल सुखी रह रही है। अब समाज पर लडकी बोझ नहीं होगी।

संत रामपाल जी महाराज को अपनाएंगे।
विश्व  को दहेज मुक्त बनाएंगे।।
अधिक जानकारी के लिए आप हमारी वेबसाइट पर देखें
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Thursday, 7 May 2020

"ध्रुव की कथा"


राजा उतानपात को अपनी पत्नी सुनीति से विवाह के कई वर्षों पश्चात् तक कोई संतान प्राप्त नहीं हुई। एक दिन नारद जी ने रानी सुनीति से बताया कि राजा का दूसरा विवाह होगा तो आपको भी संतान प्राप्त होगी और उस नई पत्नी को भी संतान प्राप्त होगी। राजा का वृद्ध अवस्था में दूसरा विवाह हुआ। छोटी पत्नी ने नगर की सीमा पर आकर राजा से वचनबद्ध होकर अपनी शर्त मानने पर विवश किया कि मैं तेरे घर तब चलूंगी, जब तू मेरी बहन को जो आपकी पत्नी है, जाते ही घर से निकालकर दूसरे मकान में रखेगा। उसको सवा सेर अन्न खाने को प्रतिदिन देगा तथा मेरे गर्भ से उत्पन्न पुत्र को राज्य देगा। सुनिती ही अपने माता-पिता के पास से जिद करके अपनी छोटी बहन सुरिती को माँगकर लाई थी। सुरिती को दुःख था कि इसने मेरे जीवन से खिलवाड़ किया है कि एक वृद्ध से मेरा विवाह कराया है। राजा ने विवश होकर यह शर्त मान ली। कुछ वर्ष पश्चात् बड़ी रानी सुनिती ने एक लड़के को जन्म दिया। उसका नाम ध्रुव रखा। बाद में छोटी रानी सुरिती को लड़का हुआ। उसका नाम उत्तम रखा। 

जानिये👇🏻
पूर्ण संत की क्या पहचान है एवं पूर्ण मोक्ष कैसे मिलेगा ?
जगतगुरु तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी से निःशुल्क नाम दीक्षा लेने के लिए कृपया यह फॉर्म भरें 👇🏻

शेष कथा 
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जब ध्रुव की आयु 5 वर्ष तथा उत्तम की 4 वर्ष की हुई तो उत्तम का जन्मदिन भी कुछ महीने पश्चात् ही था। राजा ने छोटी रानी के कहने से उत्तम का जन्मदिन मनाया। धु्रव का जन्मदिन ईर्ष्यावश नहीं मनाने दिया। नगर में धूमधाम थी। ध्रुव ने भी अपने घर से जो नगरी से दूर एक बाग में था, जन्मदिन को देखने जाने की जिद की। माता सुनिती ने कहा कि बेटा! तेरा उस नगर में कोई स्थान नहीं है। परंतु धु्रव बच्चा था, जिद करके चला गया। राजा सिंहासन पर बैठा था। साथ में रानी बैठी थी। उत्तम अपनी माता के साथ गोड़ों (गोद)में बैठा था। धु्रव जाकर पिता के गोड़ों में सिंहासन पर बैठ गया। सुरिती को ईर्ष्या तो थी ही, उसने उठकर धु्रव का हाथ पकड़कर सिंहासन से नीचे गिरा दिया, लात मारी और कहा कि यह स्थान सौतन के पुत्र के लिए नहीं है। इस पर उत्तम का अधिकार है। 
धु्रव रोने लगा और पिता की ओर देखने लगा, सोचा कि पिता मुझे बुलाऐगा, फिर से अपने पास बैठाएगा।परंतु ऐसा नहीं हुआ। आसपास अन्य मंत्री बैठे थे। नाच-गाना हो रहा था। सब यह घटना देख रहे थे। धु्रव रोता हुआ अपनी माँ के पास गया। माता को पहले ही पता था कि बेटे के साथ क्या होगा? आते ही धु्रव को अपने सीने से लगाया और कहा कि बेटा! मैंने तेरे को इसलिए मना किया था कि तू वहाँ न जा। धु्रव ने माँ से पूछा कि माँ! राजा कौन बनता है?माता ने कहा कि बेटा! राजा भगवान बनाता है। भगवान कहाँ है? कैसे मिलता है? माता ने स्वाभाविक कह दिया कि भगवान जंगल में तपस्या करने से मिलता है। धु्रव ने कहा कि माँ! मैं वन में जाकर तपस्या करके भगवान को प्राप्त करके राजा बनूंगा। यह कहकर घर छोड़कर वन की ओर जाने लगा। उसी समय रानी ने नौकर के द्वारा राजा को संदेश भेजा कि धु्रव जंगल में जाने की जिद कर रहा है, उसको संभाल लो। राजा तुरंत वहाँ पर आया और धु्रव से कहा कि बेटा! ऐसा न कर। मैं तेरे को आधा राज्य दे दूंगा। ध्रुव ने कहा कि नहीं, आप तो छोटी माता से डरते हो, आप नहीं दे पाओगे। मैं तो भगवान से राज्य प्राप्त करूँगा। यह कहकर रोता हुआ घर त्यागकर चला गया। रास्ते में नारद जी मिले। उन्होंने पूछा कि कहाँ चले? ध्रुव ने कहा कि मेरी मौसी ने मेरे को लात मारकर पिता के पास से भगा दिया। कहा कि इस राज्य पर तेरा अधिकार नहीं है, उत्तम का अधिकार है। माँ ने बताया कि राज्य भगवान देता है। मैं तपस्या करके भगवान को प्राप्त करके राज्य मागूंगा ऋषि जी। नारद ऋषि ने कहा कि पहले गुरू बनाओ। गुरू बिन साधना निष्फल होती है। धु्रव ने कहा कि आप मेरे गुरू बन जाओ। नारद ने स्वीकार कर लिया और ध्रुव को दीक्षा दी। धु्रव ने एक पैर पर खड़ा होकर साधना की, घोर तप किया। खाना-पीना भी कुछ नहीं किया। बालक का हठ तथा पूर्व जन्म की भक्ति की शक्ति के कारण छठे महीने परमात्मा प्रकट हुए
 धु्रव से कहा कि माँगो बालक! क्या माँगता है? ध्रुव ने कहा कि मुझे अटल राज्य दे दो। भगवान ने कहा कि तेरे को स्वर्ग में राज्य दूँगा। जीवन भर भक्ति कर, घर पर जा। धु्रव घर पर आ गया। धु्रव की भक्ति के कारण छोटी माता भी कुछ नम्र हुई और अपनी बड़ी बहन को सामान्य जीवन जीने की आज्ञा दे दी। उत्तम का विवाह हो गया। राज्य भी उत्तम को दिया गया। धु्रव का भी विवाह हो गया। एक बार गंधर्वों के साथ उत्तम का युद्ध हुआ। युद्ध में उत्तम की मृत्यु हो गई। धु्रव को पता चला तो गंधर्वों के साथ युद्ध करके विजय प्राप्त की। उत्तम की मृत्यु के पश्चात् पृथ्वी का राज्य भी ध्रुव को प्राप्त हुआ तथा उत्तम की पत्नी भी धु्रव को दी गई। इस प्रकार धु्रव भक्त को भक्ति करके अटल राज्य स्वर्ग का मिला तथा पृथ्वी का राज्य भी मिला। सुरिती को कर्म की सजा भी मिली जिसने अपनी बड़ी बहन को सताया था। अपने पुत्र को राजा देखना चाहती थी। वह बेटा भी नहीं रहा। जीवन नरक बना लिया।
वाणी का यही भावार्थ है कि भक्ति के बिना क्या जीवन है, धु्रव भक्त की कथा इसकी गवाह है। कहाँ तो माँ तथा बेटों को कुल सवा किलोग्राम (1250 ग्राम) अन्न मिलता था। लुखी-सूखी रोटी खाते थे। भक्ति करने से पृथ्वी तथा स्वर्ग का राज्य प्राप्त हुआ। जीवन रहा तब तक पृथ्वी पर राज्य किया, मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग में एक धु्रव मण्डल बनाया। उस नगरी पर धु्रव ने राज्य किया। 

Wednesday, 6 May 2020

कबीर जी और रामानंद जी की एक कथा

एक बार गुरु रामानंद ने कबीर से कहा कि हे कबीर! आज श्राद्ध का दिन है और पितरो के लिये खीर बनानी है. आप जाइये, पितरो की खीर के लिये दूध ले आइये....
कबीर उस समय 9 वर्ष के ही थे..
कबीर दूध का बरतन लेकर चल पडे.....चलते चलते आगे एक गाय मरी हुई पडी मिली....कबीर ने आस पास से घास को उखाड कर, गाय के पास डाल दिया और वही पर बैठ गये...!!!
दूध का बरतन भी पास ही रख लिया.....

काफी देर हो गयी, कबीर लौटे नहीं, तो गुरु रामानंद ने सोचा....
पितरो को छिकाने का टाइम हो गया है...कबीर अभी तक नही आया....तो रामानंद जी खुद चल पडे दूध लेने.
चले जा रहे थे तो आगे देखा कि कबीर एक मरी हुई गाय के पास बरतन रखे बैठे है...!!!

गुरु रामानंद बोले, अरे कबीर तू दूध लेने नही गया.?

कबीर बोले: स्वामीजी, ये गाय पहले घास खायेगी तभी तो दुध देगी...!!!
रामानंद बोले: अरे ये गाय तो मरी हुई है, ये घास कैसे खायेगी??

कबीर बोले: स्वामी जी, ये गाय तो आज मरी है....जब आज मरी गाय घास नही खा सकती...!!!
...तो आपके 100 साल पहले मरे हुए पितर खीर कैसे खायेगे...??
यह सुनते ही रामानन्दजी
मौन हो गये..!!
उन्हें अपनी भूल का ऐहसास
हुआ.!!

माटी का एक नाग बना के
पुजे लोग लुगाया
जिंदा नाग जब घर में निकले
ले लाठी धमकाया
  
जिंदा बाप कोई न पुजे
मरे बाद पुजवाया
मुठ्ठीभर चावल ले के
कौवे को बाप बनाया

यह दुनिया कितनी बावरी हैं
जो पत्थर पूजे जाय
घर की चकिया कोई न पूजे
जिसका पीसा खाय

----संत कबीर

भावार्थ:-
जो जीवित है उनकी सेवा करो..!!
वही सच्चा श्राद्ध है.!!


भक्ति से भगवान

           "भक्ति न करने से बहुत दु:ख होगा"
सूक्ष्मवेद में कहा हैं:- 
        यह संसार समझदा नाहीं,कहंदा शाम दुपहरे नूँ।
गरीबदास यह वक्त जात हैं, रोवोगे इस पहरे नूँ।।
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आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव से परमात्मा के विधान से परीचित न होने के कारण यह प्राणी इस दुःखों के घर संसार में महान कष्ट झेल रहा है और इसी को सुख स्थान मान रहा है।

उदाहरण👇👇👇
जैसे एक व्यक्ति जून के महीने में दिन के 12 या 1 बजे, हरियाणा प्रान्त में शराब पीकर चिलचिलाती धूप में गिरा पड़ा है, पसीनों से बुरा हाल है, रेत शरीर से लिपटा है। एक व्यक्ति ने कहा हे भाई! उठ, तुझे वृक्ष के नीचे बैठा दूँ, तू यहाँ पर गर्मी में जल रहा है। शराबी बोला कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ, मौज हो रही है,कोई कष्ट नहीं है।
विचार करें :- शराब के नशे में घोर धूप के ताप को झेल रहा था। फिर भी कह रहा था कि मौज हो रही है।
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सन्त गरीबदास जी ने बताया है कि मनुष्य जन्म प्राप्त करके जो व्यक्ति भक्ति नहीं करता, वह कुत्ते, गधे आदि-आदि की योनि में कष्ट उठाता है। कुत्ता रात्रि में आसमान की ओर मुख करके रोता है। इसलिए गरीबदास जी ने बताया है कि यह मानव शरीर का वक्त एक बार हाथ से निकल गया और भक्ति नहीं की तो इस समय (इस पहरे) को याद करके रोया करोगे।

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