कबीर साहेब जी सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलयुग चारों युगो में अलग अलग नामों से आते है और लीला करते ही।
1.सतयुग मे सतसुकृत
2. त्रेतायुग में मुनींद्र
3. द्वापर में करूणामय
3. कलयुग मे अपने वास्तविक नाम कबीर से ही इस धरा पर प्रकट होते है और
यहां आकर अपनी अच्छी आत्माओं को मिलते है उन्हें अपना ज्ञान बताते हैं और सतलोक दिखाकर भरोसा दिलाते है और सतभक्ति देकर वापस सतलोक चले जाते हैं और हर पल अपने भक्त की रक्षा करते है।
गरीब दास जी को भी परमात्मा कबीर साहेब सतलोक से आकर मिले
गरीब, जैसे सूरज के आगे बदरा, ऐसे कर्म छया रे। प्रेम की पवन करे चित मंजन, झलकै तेज नया रे।।
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कबीर जी ऐसे अविगत राम हैं जो तीनों गुणों तथा भौतिक शरीर की इन्द्रियों से न्यारे हैं। उनका शरीर तथा सामर्थ्य सबसे भिन्न और अधिक है। उसका कोई अन्त नहीं है। वह बेचून यानि अव्यक्त है। जैसे सूर्य के सामने बादल छा जाते हैं, उस समय सूर्य अव्यक्त होता है। उसी प्रकार परमात्मा और आत्मा के मध्य पाप कर्मों के बादल अड़े हैं। जिस कारण से परमेश्वर विद्यमान होते हुए भी अव्यक्त है, दिखाई नहीं देता।
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